Description
कविता अन्तर्मन की वह अनुभूति होती है, जो भावनाओं को व्यक्त करने के लिए कागज पर अपने-आप उतर जाती है। ‘सृजन’ में आम आदमी की पीड़ा को शब्दों में उड़ेलते हुए तथा उनकी समस्याएँ, उनका दर्द महसूस किया गया है।
कविता अन्तर्मन की वह अनुभूति होती है, जो भावनाओं को व्यक्त करने के लिए कागज पर अपने-आप उतर जाती है। ‘सृजन’ में आम आदमी की पीड़ा को शब्दों में उड़ेलते हुए तथा उनकी समस्याएँ, उनका दर्द महसूस किया गया है।
| Srijan remove | Darakte Rishte remove | Bewafa Waqt remove | Itihas Ke Watayan Se remove | |
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| Name | Srijan remove | Darakte Rishte remove | Bewafa Waqt remove | Itihas Ke Watayan Se remove |
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| Content | कविता अन्तर्मन की वह अनुभूति होती है, जो भावनाओं को व्यक्त करने के लिए कागज पर अपने-आप उतर जाती है। ‘सृजन’ में आम आदमी की पीड़ा को शब्दों में उड़ेलते हुए तथा उनकी समस्याएँ, उनका दर्द महसूस किया गया है। | ऐसे संवेदनशील वातावरण में जबकि वैवाहिक संबंधों का अस्तित्व संक्रमण काल से गुजर रहा है, ‘घिसटता घरौंदा’ एक सुखद संकेत तथा आस्था की नई दस्तक के साथ सामने पेश करने का प्रयास किया गया है। मानवीय मूल्यों को बचाए रखने के लिए भरसक रचनात्मक पहल करते हुए समकालीन परिप्रेक्ष्य के उन तमाम कमियों और सुधारों पर प्रकाश डाला गया है, जो यथार्थ की सुदृढ़ नींव है। प्रेम-विवाह के बाद संबंधों के बनते-बिगड़ते समीकरण और शादी के बाद उत्पन्न हालात का जायजा शब्दों की आंखों से साफ दिखाई देता है। संबंधों को निभाने के लिए वक्त की पीड़ाओं व बद्हालियों का बहुत सुंदर और सहज समाधान निकालने का प्रयास किया गया है। | ‘बेवफा वक्त’ की मार्मिक संवेदनशीलता बरकरार रखते हुए अनोखी शैली में संस्मरणात्मक रूप दिया गया है। पूरी पुस्तक में औपन्यासिक रोचकता का ध्यान रखा गया है। इसमें विभिन्न मानवीय चित्तवृतियों को मनोवैज्ञानिक ढंग से बहुत ही अच्छी तरह और ईमानदारी से उकेरा गया है। इसकी कहानी आत्म-केन्द्रित होते हुए भी एक विशाल कैनवस पर उतरी जान पड़ती है। पुस्तक समाप्त करने के बाद पाठक तय नहीं कर पाते हैं कि वे उपन्यास पढ़ रहे थे या डायरी, इसे रिपोर्ताज कहा जाये या आत्म कथा, यह समाज विज्ञान की पुस्तक है अथवा ललित निबंध की। एक विद्या में अनेक विधाओं को समेटकर एक नई विधा तराशी गयी है। | हम धर्मनिरपेक्षी इतिहास बरसों से लिख रहें हैं, किन्तु साम्प्रदायिकता बढ़ती जा रही है। आज लोग गलत बातों में सिर खपाते हैं और शिकायत को ‘मुद्दा’ बनाकर अपनी व्यवस्था के ‘जहर’ को बाहर नहीं निकाल फेंकना चाहते, क्योंकि यह ‘जहर’ उनकी राजनीति को कायम रखे हुए है। अगर हिन्दू-मुसलमान मिलकर एक ‘अखंड भारत’ की स्थापना करें, तो दुश्मन खुद कमजोर पड़ जायेंगे, क्योंकि भारत का हर दंगा दुश्मनों के नापाक इरादों को पूरा करता है। यदि हम एक हजार साल के हिन्दू-मुस्लिम मेल-मिलाप को दरकिनार कर देते हैं, तो उन सैयद इब्राहिम रसखान का क्या होगा, जिन्होंने श्रीकृष्ण के बाल-लीलाओं का गुणगान भगवान मानकर किया है? क्या हम सालबेग को इसलिए बरतरफ कर दें कि वे मुसलमान थे? क्या हम इस तथ्य को नजरअंदाज कर दें कि उड़ीसा के हर गांवों में श्री जगन्नाथ जी का स्वागत आज भी सालबेग के भक्ति गीतों से किया जाता है। अजमेर के मुस्लिम गायक मीरा बाई और बुल्लेशाह का भजन गाते हैं। गरासिया मुसलमान मातृदेवी की पूजा करते हैं। अलवर और भरतपुर के मेव मुसलमान अपने को श्रीकृष्ण और अर्जुन का वंशज मानते हैं और महाभारत का पाठ सस्वर करते हैं। डा- मासूम रजा ‘राही’ के कलम से निकला ‘महाभारत’ धारावाहिक भारतीय संस्कृति का बेजोड़ नमूना है। बंगाली मुस्लिम कारीगरों द्वारा देवी दुर्गा का प्रतिमा-निर्माण करना आदि राष्ट्रीय एकता का ज्वलंत उदाहरण है। इस पुस्तक में अतीत के अनेक अनछुए पहलुओं पर प्रकाश डाला गया है जो यथार्थ होते हुए भी अभी तक ओझल था। पुस्तक का मुख्य उद्देश्य सामयिक, सामाजिक समस्याओं के संदर्भ में हकीकत का दोनों पहलू दिखाकर राष्ट्रीयता की भावना को मजबूत करते हुए आपसी भाईचारे का पुनर्निमाण करना है। आज की इस भाग-दौड़ वाली जिंदगी में लोगों के पास उतना समय नहीं होता कि वे मोटे ग्रंथों का समुचित अध्ययन कर सकें। इसमें कम पृष्ठों में अधिक से अधिक तथ्यों को समेटा गया है। चूंकि ‘इतिहास के वातायन से’ का सृजन इतिहास के गर्भ से हुआ है। अतः तथ्य संबंधी चूक की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि- ‘जिन खोजा तिन पाइयां, गहरे पानी पैठ’। इसमें वर्णित तथ्य अंतिम सत्य नहीं हो सकते। इतिहास जैसे विषय पर नित नये हो रहे अनुषंधानित प्रतिपादनों को देखते हुए इसे अंतिम होने का दावा नहीं किया जा सकता। |
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