Description
हम धर्मनिरपेक्षी इतिहास बरसों से लिख रहें हैं, किन्तु साम्प्रदायिकता बढ़ती जा रही है। आज लोग गलत बातों में सिर खपाते हैं और शिकायत को ‘मुद्दा’ बनाकर अपनी व्यवस्था के ‘जहर’ को बाहर नहीं निकाल फेंकना चाहते, क्योंकि यह ‘जहर’ उनकी राजनीति को कायम रखे हुए है। अगर हिन्दू-मुसलमान मिलकर एक ‘अखंड भारत’ की स्थापना करें, तो दुश्मन खुद कमजोर पड़ जायेंगे, क्योंकि भारत का हर दंगा दुश्मनों के नापाक इरादों को पूरा करता है।
यदि हम एक हजार साल के हिन्दू-मुस्लिम मेल-मिलाप को दरकिनार कर देते हैं, तो उन सैयद इब्राहिम रसखान का क्या होगा, जिन्होंने श्रीकृष्ण के बाल-लीलाओं का गुणगान भगवान मानकर किया है? क्या हम सालबेग को इसलिए बरतरफ कर दें कि वे मुसलमान थे? क्या हम इस तथ्य को नजरअंदाज कर दें कि उड़ीसा के हर गांवों में श्री जगन्नाथ जी का स्वागत आज भी सालबेग के भक्ति गीतों से किया जाता है।
अजमेर के मुस्लिम गायक मीरा बाई और बुल्लेशाह का भजन गाते हैं। गरासिया मुसलमान मातृदेवी की पूजा करते हैं। अलवर और भरतपुर के मेव मुसलमान अपने को श्रीकृष्ण और अर्जुन का वंशज मानते हैं और महाभारत का पाठ सस्वर करते हैं।
डा- मासूम रजा ‘राही’ के कलम से निकला ‘महाभारत’ धारावाहिक भारतीय संस्कृति का बेजोड़ नमूना है। बंगाली मुस्लिम कारीगरों द्वारा देवी दुर्गा का प्रतिमा-निर्माण करना आदि राष्ट्रीय एकता का ज्वलंत उदाहरण है।
इस पुस्तक में अतीत के अनेक अनछुए पहलुओं पर प्रकाश डाला गया है जो यथार्थ होते हुए भी अभी तक ओझल था। पुस्तक का मुख्य उद्देश्य सामयिक, सामाजिक समस्याओं के संदर्भ में हकीकत का दोनों पहलू दिखाकर राष्ट्रीयता की भावना को मजबूत करते हुए आपसी भाईचारे का पुनर्निमाण करना है। आज की इस भाग-दौड़ वाली जिंदगी में लोगों के पास उतना समय नहीं होता कि वे मोटे ग्रंथों का समुचित अध्ययन कर सकें। इसमें कम पृष्ठों में अधिक से अधिक तथ्यों को समेटा गया है।
चूंकि ‘इतिहास के वातायन से’ का सृजन इतिहास के गर्भ से हुआ है। अतः तथ्य संबंधी चूक की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि- ‘जिन खोजा तिन पाइयां, गहरे पानी पैठ’। इसमें वर्णित तथ्य अंतिम सत्य नहीं हो सकते। इतिहास जैसे विषय पर नित नये हो रहे अनुषंधानित प्रतिपादनों को देखते हुए इसे अंतिम होने का दावा नहीं किया जा सकता।








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